देश तोड़ने वाली सोच के परम विरोधी थे डॉ. आंबेडकर

-1949 में पीएम नेहरू के सलाह पर शेख अब्दुल्ला ने संविधान निर्माता समिति के अध्यक्ष डॉ. आंबेडकर से कश्मीर राज्य के लिए अलग से संविधान का मसौदा तैयार करने का किया था अनुरूरोध

डॉ. संजय मयूख

संप्रभु राष्ट्र में लोकतांत्रिक व्यवस्था के अंतर्गत एक ही सर्वोच्च संस्थान, एक विधान और एक निशान को महत्व देने वाले विद्वान, कानूनविद् और देशभक्त डॉ. भीमराव रामजी आंबेडकर ने स्वतंत्र भारत में बोयी जा रही देश को “टुकडे-टुकड़े करने वाली नीतियों एवं सोच” के विरोध में प्रखर आवाज बुलंद की थी। उन्होंने स्वतंत्र भारत के पहले कानून एवं न्‍याय मंत्री होने के नाते जम्मू एवं कश्मीर को संविधान के अनुच्‍छेद 370 के माध्यम से दिए जाने वाले विशेष राज्य के दर्जा का पुरजोर विरोध किया था।

स्वतंत्रता के 70 साल बाद 21वीं के सदी के महानायक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में गृहमंत्री अमित शाह की देश को अखंड रखने की रणनीति ने जम्मू एवं कश्मीर के लिए लागू अनुच्‍छेद 370 को धराशायी कर दिया और इसके साथ ही जम्मू एवं कश्मीर भारत का अभिन्न अंग बन गया। नरेंद्र मोदी एवं अमित शाह ने बाबा साहब आंबेडकर, डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी और पंडित दीनदयाल उपाध्याय के संप्रभु राष्ट्र “भारत” की परिकल्पना को साकार कर दिया जबकि, देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने तत्कालीन कानून मंत्री डॉ. आंबेडकर के विरोघ के बावजूद देश पर अनुच्‍छेद 370 को थोपा था।

कांग्रेस ने अनुच्‍छेद 370 को एक राजनीतिक औजार की तरह इस्तेमाल किया और इसके माध्यम से देश में टुकड़े-टुकड़े गैंग को फलने व फूलने का अवसर दिया। कांग्रेस और विभिन्‍न क्षेत्रीय दल पिछड़ों एवं दलितों को राजनीतिक वोट बैंक मानकर उन्‍हें साधने के लिए हमेशा डॉ. आंबेडकर का नाम जपते रहते है। परंतु, इन दलों ने कभी कोई ऐसा कदम नहीं उठाया, जिससे बाबा साहब के सपने साकार हो सकें। 14 अप्रैल को बाबा साहब आंबेडकर की जयंती पर अनुच्‍छेद 370 और टुकड़े-टुकड़े गैंग की चर्चा करने पर कई लोगों को आपत्ति हो सकती है, किंतु इतिहास के पन्नों में दर्ज सच को नकारा नहीं जा सकता।

स्वतंत्रता के अमृत महोत्सव के समय में भी देश की एक महत्वपूर्ण पार्टी कांग्रेस द्वारा दुकड़े-टुकड़े गैंग को समर्थन देने की नीति चिंता का विषय है। क्‍योंकि, एक ओर भारतीय जनता पार्टी की हर नीतियों एवं उसके कार्यो को लेकर कांग्रेस बाबा साहब आंबेडकर का नाम लेकर संविधान की रक्षा करने का गुहार लगाती है, तो दूसरी ओर कांग्रेस नेता राहुल गांधी दिल्ली स्थित जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय जाकर “भारत तेरे टुकड़े होंगे …” नारे लगाने वाले शरजील इमाम, कन्हैया कुमार जैसे लोगों का समर्थन करते हैं। भारत के संसद भवन पर आतंकी हमला कराने वाले मास्टर माइंड अफजल गुरु की बरसी पर जेएनयू में देश विरोधी नारे लगाते हुए उन लोगों का वीडियो उस वक्त सोशल मीडिया में खूब वायरल हुआ था।

भारत की स्वतंत्रता के अमृत महोत्सव के काल में जब हम अनुच्‍छेद 370 पर सोचते हैं, तो डॉ आंबेडकर की दूरदर्शिता और राष्‍ट्रभक्ति स्‍पष्‍ट रूप से परिलक्षित होती है। जब 26 अक्टूबर 1947 को जम्मू में महाराजा हरि सिंह ने भारत सरकार के साथ विलय पर हस्ताक्षर किए थे, तब विलय में राज्य को विशेष दर्जा (बाद में अनुच्‍छेद 370 बना) देने के लिए विशेष कानून की व्यवस्था करने का जिक्र नहीं था। सिर्फ राज्य को स्वायत्तता देने की बात की गई थी। राज्य के अंतरिम प्रधानमंत्री शेख अब्दुल्ला जम्मू एवं कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा और अपने राज्य के लिए विशेष संविधान चाहते थे। विलय के बाद 5 मार्च 1948 को शेख अब्दुल्ला जम्मू एवं कश्मीर के प्रधानमंत्री (“प्रधानमंत्री” शब्‍द पर ध्‍यान देने की बात है) नियुक्त किए गए। ब्लॉग लॉ कॉर्नर के अनुसार 1949 में प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के सलाह पर शेख अब्दुल्ला संविधान निर्माता समिति के अध्यक्ष डॉ. आंबेडकर के पास जाकर कश्मीर राज्य के लिए अलग से संविधान का मसौदा तैयार करने का अनुरूरोध किया। देश के पहले कानून मंत्री डॉ. भीमराव आंबेडकर ने जम्मू एवं कश्मीर के लिए अनुच्‍छेद 370 का ड्राफ्ट बनाने से इनकार कर दिया। डॉ. आंबेडकर को लगता था कि जम्मू एवं कश्मीर राज्य के लिए अलग से कानून बनाने पर भविष्य में कई तरह की समस्याएं पैदा होंगी, जिसे सुलझाना मुश्किल होगा। और, ऐसा हुआ भी। अनुच्‍छेद 370 भारत के दिल में कांटे की तरह धंसा रहा।

जम्मू एवं कश्मीर को विशेष दर्जा देने के विरोध में डॉ. आंबेडकर ने शेख अब्दुल्ला से मुलाकात के दौरान कहा था- “आप चाहते हैं कि भारत आपकी सीमाओं की रक्षा करे, आपकी सड़कें बनवाए, आपको खाना, अनाज पहुंचाए… फिर तो उसे वही स्टेटस मिलना चाहि, जो देश के दूसरे राज्यों का है। इसके उलट आप चाहते हैं कि भारत सरकार के पास जम्मू एवं कश्मीर में सीमित अधिकार रहे और भारतीय लोगों के पास कश्मीर में कोई अधिकार नहीं रहे। अगर आप इस प्रस्ताव पर मेरी मंजूरी चाहते हैं, तो मैं कहूंगा कि ये भारत के हितों के खिलाफ है। एक भारतीय कानून मंत्री होने के नाते मैं ऐसा कभी नहीं करूंगा।“ जब आंबेडकर ने प्रस्‍ताव को एक सिरे से खारिज कर दिया, तो शेख अब्दुल्‍ला ने भारत के प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू को एप्रोच किया। इसके बाद प्रधानमंत्री नेहरू के निर्देश पर अंग्रेजों के शासन एवं प्रशासन में काम करने वाले और स्वतंत्रता मिलने पर संविधान निर्माता समिति के सदस्य गोपालस्वामी आयंगर ने जम्मू एवं कश्मीर के लिए अनुच्‍छेद 370 का ड्राफ्ट बनाया। कहा जाता है कि गोपालस्वामी आयंगर ने शेख अब्दुल्ला के सभी एजेंडे को शत-प्रतिशत इस अनुच्‍छेद में शामिल नहीं किया, जिसे लेकर शेख अब्दुल्ला उनसे भी नाराज रहे।

कांग्रेस अनुच्‍छेद 370 को राजनीतिक औजार की तरह इस्तेमाल कर सत्तर सालों तक राजनैतिक रोटियां सेंकती रही। कांग्रेस को इस बात की कोई चिंता नहीं थी कि इस नीति से देश में अलगावावाद और आतंकवाद फल-फूल रहा है। जम्‍मू एवं कश्‍मीर तथा देश के कई भागों में सैंकड़ों आतंकी हमले हुए, हजारों मासूमों की जानें गईं और भारतीय सेना के सैकड़ों जवान शहीद हुए, लेकिन कांग्रेस ने सत्‍ता की लालच में इससे कोई मतलब नहीं रखा। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने वर्ष 2014 में केंद्र में भाजपा की सरकार बनने के बाद देश में आतंकवाद को जड़ से समाप्त करने के लिए कड़े कदम उठाने का निर्णय लिया।

प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में गृहमंत्री अमित शाह की सफल रणनीति के कारण 5 अगस्त 2019 को भारतीय संसद में जम्मू एवं कश्मीर के लिए लागू अनुच्‍छेद 370 और 35-ए निरस्त कर दिया गया। इसके बाद भारत के अन्य राज्यों की तरह जम्मू एवं कश्मीर भी देश का अभिन्न अंग बन गया। गृहमंत्री अमित शाह की बेहतरीन रणनीति की वजह से जम्मू एवं कश्मीर में फिर से शांति बहाल हुई और राज्‍य विकास की मुख्यधारा से जुड़ गया। केंद्र सरकार की पिछड़ों एवं वंचितों की सभी योजनाएं वहां कार्यान्वित होनी शरू हो गई, जो अनुच्‍छेद 370 की वजह से क्रियान्वित नहीं होती थीं। नरेन्द्र मोदी ने अलगाववाद की राजनीति करने वालों पर वैसा ही प्रहार किया है, जैसे बाबा साहब आंबेडकर ने वर्षो पहले किया था।

-लेखक भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय मीडिया सह- प्रभारी, राष्ट्रीय प्रवक्ता एवं बिहार विधान परिषद के सदस्य हैं।

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