फ्रेंडशिप का मतलब सिखाती फिल्में और उनमें जय-वीरू की दोस्ती की मिसाल

-इंसान के जीवन का सबसे बड़ा और वास्तविक उपहार है सच्ची दोस्ती

नई दिल्ली। हर साल अगस्त के पहले रविवार को मनाया जाने वाला फ्रेंडशिप डे दोस्तों का सबसे खास त्यौहार माना जाता है, जिसे लगभग सभी लोग सेलिब्रेट करते हैं। क्योंकि दोस्त हमारे जीवन में बहुत महत्व रखता है और हर कोई दोस्त की कंपनी का आनंद लेता है। जीवन में एक अच्छे दोस्त का होना और सच्ची दोस्ती हासिल होना आज के दौर में खुशनसीबी की बात है। दरअसल, दोस्ती जीवन का सबसे बड़ा और वास्तविक उपहार है।

बॉलीवुड ने भी अपनी फिल्मों के जरिए दोस्ती के महत्व को बताने की कोशिश की है। इस विषय पर न जानें कितनी फिल्में बनी हैं, न जानें कितने ही गाने फिल्माए गए हैं, जो सुपर-डुपर हिट भी रहे हैं। ऐसे ही तीन दोस्तों की दिल को छू लेने वाली कहानी थी फिल्म ‘दिल चाहता है’। ‘दिल चाहता है’ में विचारों में अंतर होने के बाद भी तीन दोस्त एक-दूसरे का नजरिया समझने की कोशिश करते हैं। 10 अगस्त 2001 में रिलीज फरहान अख्तर निर्देशित फिल्म ने लोगों के दिलों में खास जगह बनाई है। 120 मिलियन के बजट में बनी दिल चाहता है का बॉक्स ऑफिस कलेक्शन 456 मिलियन था ।

‘थ्री इडियट्स’ में तीन दोस्त तीन अलग-अलग तरह की मानसिकताओं का प्रतिनिधित्व करते हैं लेकिन उनकी दोस्ती में कभी दरार नहीं आती। ये फिल्म सुपरहिट साबित हुई थी। इंजीनियरिंग कॉलेज के बैकग्राउंड पर बनीं यह फिल्म शिक्षा पद्घति पर बदलावों पर खुला विमर्श करती है। आमिर, माधवन और शरमन की ये फिल्म आज भी दोस्ती की मिसाल कायम करती है।

राकेश ओमप्रकाश मेहरा निर्देशित यह फिल्म भी दोस्ती की कहानी को शानदार तरीके से कहती है। देशप्रेम और दोस्ती के पुट के साथ। दिल्ली विश्वविद्यालय के 5 छात्र अपनी सामाजिक जवाबदेही निभाते हुए किस तरह से देश की सुर्खियों बन जाते हैं यह फिल्म इसी विषय पर फोकस करती है। अलग-अलग सामाजिक और आर्थिक वर्ग से आने वाले यह दोस्त एक सपने के साथ आगे बढ़ते हैं और टीम बनाकर उसे पूरा करते हैं।

फिल्म ‘जिंदगी न मिलेगी दोबारा’ दोस्ती की कहानी कुछ अलग ढंग से कहती है। यह फिल्म जीवन में दोस्ती के महत्व को अंडरलाइन करती हुई चलती है। यह फिल्म बताती है कि जीवन में खुद से बात से करना, अपने सपनों से बात करना और अपने दोस्तों से बात करना कितना जरूरी है।

दोस्ती की बात हो और फिल्म ‘शोले’ का जिक्र न हो कैसे हो सकता है। 1975 में आई फिल्म शोले में जय-वीरू की दोस्ती हिंदी सिनेमा की आइकॉनिक फ्रेंडशिप में शुमार हो गई। दोनों हमेशा साथ रहते थे और एक-दूसरे पर जान छिड़कने को तैयार रहते थे। इस फिल्म में जय वीरू की दोस्ती के जज्बे ने दुनिया में दोस्ती की एक मिसाल कायम कर दी है।

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