किसानों की नाराजगी की भरपाई डेरा अनुयायियों से पूरी करने की कवायद में भाजपा

-पंजाब में डेरों की संख्या देश में सबसे ज्यादा, 12000 से अधिक डेरे के अनुयायियों की संख्या भी है बहुत ज्यादा

मनोज ठाकुर, चंडीगढ़

पंजाब में पहली बार किसी मजबूत साथी के बिना उतरी भाजपा के लिए यहां के डेरे खासे महत्वूपर्ण साबित हो सकते हैं। किसानों की नाराजगी से जो सियासी नुकसान भाजपा को हो रहा है,इसकी भरपाई पार्टी डेरों के समर्थकों को साथ जोड़ कर पूरी करने की कोशिश में हैं। इसकी तैयारी शुरू हो गई है। पार्टी के रणनीतिकार लगातार लगातार डेरों का समर्थन जुटाने की कोशिश में हैं।

डेरों की सियासत और सियासत में डेरों पर रिसर्च करन वाले राजकुमार पूर्व पत्रकार राजकुमार भारद्वाज ने बताया कि
राज्य में सभी वर्गों के 12,000 से अधिक डेरे हैं। इसके अलावा, सिख धर्म से जुड़े 9000 डेरे हैं। इनमें से 300 डेरे खासे मजबूत है। पंजाब में इनके अनुयायियों की संख्या बहुत ज्यादा है।
यह 300 बड़े और मशहूर डेरे सीधे तौर पर चुनाव को प्रभावित करते हैं।

डेरे पंजाब विधानसभा की 117 में से 93 सीटों को प्रभावित करते हैं। 47 सीटें ऐसी हैं जहां डेरे चुनावी परिदृश्य को बदल सकते हैं। 46 सीटों पर डेरे मतदान में बड़ा अंतर लाने की क्षमता रखते हैं।पंजाब में मतदाताओं की संख्या 2.12 करोड़ है। यहां के लगभग 25 प्रतिशत लोग डेरों से जुड़े हुए हैं। प्रदेश के 12 हजार 581 गांवों में 1.13 लाख डेरों की शाखाएं हैं।

राजकुमार भारद्वाज ने बताया कि डेरे राजनीति में सीधे तौर पर सक्रिय नहीं होते। वह यह दिखाते भर है। हकीकत तो यह है कि वह राजनीति में गहरी रुचि लेते हैं। उन्होंने अपने राजनीतिक विंग बना रखे हैं। जो चुनाव के वक्त किस समर्थन देना है, क्या करना है सब तय करते हैं।

समय समय पर डेरो में राजनेता आते रहते हैं। इसलिए डेरे दिखाते ऐसे है कि वह राजनीति से दूर है, पर किसी न किसी स्तर पर राजनीति से जुड़े रहते हैं।चुनाव से एक दिन पहले डेरो की ओर से इशारा किया जाता है कि किसे मतदान करना है। देखते ही देखते यह इशारा सभी को चला जाता है।

क्यों है इतने ज्यादा डेरे?

राजकुमार भारद्वाज ने बताया कि वास्तव में, ऐसे कई कारण हैं जिनकी वजह से लोग डेरों से जुड़ते हैं।गांव में सवर्ण जाति के सिख पिछड़ी और दलित समुदाय के लोगों को गुरुद्वारे में आने से रोकने की कोशिश करते हैं। अपनी पहचान की खातिर यह लोग डेरों से जुड़ जाते हैं। पंजाब में क्योंकि धर्म और आस्था के प्रति लोगों में बड़ा रुझान है। सिख धार्मिक तौर पर ज्यादा सक्रिय रहते हैं। उनकी देखादेखी में दूसरे समुदाय भी उतना ही सक्रिय होना चाहते हैं। इसलिए वह डेरों के साथ जुड़ कर धार्मिक तौर पर सक्रिय रहते हैं। नशा एक प्रमुख वजह है। इसके साथ ही गरीबी की वजह से भी लोग डेरों के साथ जुड़ जाते हैं। सबसे बड़ी वजह तो यह है कि डेरो के साथ जुड़ कर लोग खुद को मजबूत और संगठित करने की कोशिश करते हैं। उनकी कोशिश रहती है कि यदि एकजुट रहेंगे तो रोजमर्रा की दिक्कत नहीं आएगी। डेरो के माध्यम से जुड़ने में उन्हें लगता है कि वह धार्मिक रूप से एकजुट हो रहे हैं। इस तरह की सोच डेरो को पंजाब में मजबूती प्रदान करती है।

डेरों को लेकर लोगों के मन में भक्ति है और यहां हर जाति और धर्म के लोग आते हैं। लेकिन दलित और पिछड़े वर्ग सबसे कमजोर हैं जो आर्थिक रूप से मजबूत नहीं हैं। पंजाब में डेरों के अस्तित्व का मुख्य कारण सामाजिक असमानता है। सामाजिक और आर्थिक क्षेत्रों में पंजाब में जाट सिखों का वर्चस्व है। दलित कुल जनसंख्या 2011 के अनुसार 31.8 प्रतिशत थी जो कि 2021 आते आते 34.6 प्रतिशत हो गई हैं, जो किसी भी राज्य में सबसे अधिक है, लेकिन उनकी आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी नहीं है। ऐसे सामाजिक ताने-बाने में पंजाब के भीतर के डेरों ने दलित चेतना पैदा करने का काम किया। शिविरों ने दलित समुदाय की शिक्षा और स्वास्थ्य देखभाल की जिम्मेदारी भी संभाली है।

प्रमुख डेरे और उनकी पकड़

पंजाब के सिरसा में डेरा सच्चा सौदा की शाखाओं की संख्या करीब 10,000 है। मालवा क्षेत्र की 40 से 46 सीटों पर प्रभाव है। 32 सीटों पर डेरा सच्चा सौदा अनुयायी निर्णायक भूमिका में रहते हैं। इसके बाद 1891 में शुरू हुए डेरा राधा स्वामी का 10-12 सीटों पर प्रभाव है। माझा की 2-3 और मालवा की 7-8 सीटों पर नामधारी समुदाय का प्रभाव है। माझा में 4-5 और दोआबा में 3-4 सीटों पर दिव्य ज्योति जागृति संस्थान की मजबूत पकड़ मानी जाती है। इसके अलावा, 27 देशों में फैले निरंकारी मिशन ने मालवा में 3-4 और माझा में 2-3 सीटों को प्रभावित किया है।

पटियाला – राधा स्वामी सत्संग ब्यास और निरंकारी मिशन, डेरा सच्चा सौदा।
मुक्तसर – दिव्य ज्योति जागृति संस्थान, डेरा सच्चा सौदा और राधा स्वामी सत्संग ब्यास।
नवांशहर – दिव्य ज्योति जागृति संस्थान और गरीबदासी संप्रदाय से संबंधित शिविर।
कपूरथला – दिव्य ज्योति जागृति संस्थान, राधा स्वामी सत्संग डेरा ब्यास और निरंकारी मिशन।
जालंधर दिव्य ज्योति जागृति संस्थान, डेरा सचखंड रायपुर सेना और निरंकारी मिशन।
पठानकोट – डेरा जगत गिरि आश्रम,
रोपड़ – बाबा हरनाम सिंह खालसा (धूम्मा) का डेरा और
बाबा प्यारा सिंह भानियारन के डेरा तरनतारन का प्रभाव – दिव्य ज्योति जागृति संस्थान।
कोटकपुरा – डेरा सच्चा सौदा, निरंकारी मिशन, राधा स्वामी सत्संग ब्यास, दिव्य ज्योति जागृति संस्थान
संगरूर, मानसा, बठिंडा, बरनाला, फरीदकोट, फिरोजपुर, अबोहर के साथ मोहाली का कुछ हिस्से में डेरा सच्चा सौदा का प्रभाव है।

राजनीतिक दलों के प्रति डेरो की सोच समय समय पर बदलती रही है

राज्य की अब तक की दो सबसे बड़ी पार्टियों, चाहे वह कांग्रेस हो या अकाली दल, ने डेरा का समर्थन लिया है। 2007 के चुनाव में डेरा सच्चा सौदा ने कांग्रेस की जीत में अहम भूमिका निभाई थी। मालवा क्षेत्र में कांग्रेस को भारी समर्थन मिला।

2009 के लोकसभा चुनाव में डेरा सच्चा सौदा के समर्थन से शिरोमणि अकाली दल ने जीत हासिल की थी। नतीजा यह रहा कि हरसिमरत कौर ने कैप्टन अमरिंदर सिंह के बेटे रनिंदर सिंह को एक लाख वोटों से हराया। डेरा सच्चा सौदा ही नहीं कांग्रेस और शिरोमणि अकाली दल के नेता नामधारी, राधास्वामी आदि अपने लाखों समर्थकों का वोट पाने के लिए सभी डेरों के दरवाजे पर नतमस्तक रहते हैं। 2017 के विधानसभा चुनाव के दौरान शायद ही कोई ऐसा नेता हो जो अपनी पार्टी का समर्थन हासिल करने के लिए इन डेरे में न गया हो। 2016 में राहुल गांधी डेरा ब्यास पहुंचे थे। इस तरह से डेरा कभी अकाली दल तो कभी कांग्रेस को समर्थन देता रहा है।

भाजपा के लिए इस बार संभावना क्यों है?

पंजाब के राजनीतिक समीक्षक वीरेंद्र भारत ने बताया, इसके पीछे सीधा कारण भाजपा धर्म को साथ लेकर चलती है। पंजाब में सिख क्योंकि प्रभावशाली रहते हैं,इसलिए डेरो से जुड़े लोगों में मन में इसे लेकर रोष रहता है। भाजपा को वोट कर वह खुद इस गुस्से को निकाल सकता है। दूसरा डेरों में धर्म की शिक्षा दी जाती है, इसलिए भी उनकी सोच भाजपा के साथ मिलती है। भाजपा पहली बार पंजाब में अपनी उपस्थिति दर्ज कराने की कोशिश में हैं,इसलिए डेरो के समर्थक इसे अपने लिए मौका मान कर चल रहे हैं। बेअदबी कांड भी गैर सिख वोटर्स को डरा रहा है, उन्हें लगता है कि इस स्थिति से भाजपा बचा सकती है।

बड़ी बात तो यह है कि कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष नवजोत सिंह सिद्धू जिस तरह से बेअदबी कांड को लेकर आवाज उठा रहे हैं, उनका इशारा गुरमीत राम रहीम की ओर है। जो रेप के आरोप में इस वक्त हरियाणा के रोहतक की सुनारिया जेल में सजा काट रहे हैं। सिद्धू के अवाज उठाने का नतीजा यह निकला कि पंजाब में डेरा सच्चा सौदा से जुड़े अनुयायी कांग्रेस के प्रति गुस्से में हैं। आम आदमी के सांसद भगवंत मान और अरविंद केजरीवाल भी

डेरा सच्चा सौदा के प्रमुख पर टिप्पणी करते रहते हैं। जो कि बड़ी वजह है कि डेरा सच्चा सौदा के अनुयायी आम आदमी पार्टी के साथ खड़ा होने में परहेज करेंगे। पंजाब में कांग्रेस की सरकार है, इस सरकार में भी डेरा के लोगों के प्रति प्रशासन का रवैया उपेक्षित रहा। अकाली दल भी कमोबेश डेरों की उम्मीद पर खरे नहीं उतरे। सबसे बड़ी बात तो यह है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जिस तरह से काम कर रहे हैं, डेरा के अनुयायियों में वह खासे लोकप्रिय भी है। इसलिए पंजाब के विधानसभा चुनाव में डेरा अनुयायी भाजपा के लिए मजबूत संभावना पैदा करते नजर आ रहे हैं।

Comments are closed.