पंजाब चुनाव में इस बार शांत क्यों है एनआरआई, ‘आप’ ने किया नाराज या कुछ और वजह है खास

-अपने सूबे से लगाव रखने वाले पंजाबी एनआरआई अक्सर चुनावी प्रक्रिया के दौरान रहते हैं खासे सक्रिय

◆मनोज ठाकुर

पंजाब में एनआरआई (अनिवासी भारतीय) की एक बड़ी भूमिका रहती है। वह चाहे तीन कृषि कानूनों के विरोध में चलाया गया आंदोलन हो या फिर आम आदमी पार्टी का पंजाब में इतनी उंचाई छूना। इस सभी में कहीं न कहीं एनआरआई की भूमिका भी रही है। 2014 और 2017 के विधानसभा चुनाव में पंजाबी एनआरआई खासे सक्रिय रहे। लेकिन इस बार वह खामोश नजर आ रहे हैं, जिस तरह से आम आदमी पार्टी को लेकर एनआरआई में एक रूझान था, वह नजर नहीं आ रहा है। इसे आम आदमी पार्टी के लिए धक्का भी माना जा रहा है।

पंजाब मॉस कम्युनिकेशन एंड पब्लिक रिलेशन इंस्टीट्यूट के प्रोफेसर डाक्टर हरबंस सिंह के अनुसार, विदेश में बस चुके पंजाबियों का अपने राज्य के प्रति एक विशेष लगाव है। इस वजह से वह यहां सक्रिय रहते हैं। किसान आंदोलन इतना लंबा न चलता, यदि एनआरआई की इसमें सपोर्ट न होती।

एनआरआई समय- समय पर पंजाब की राजनीति में भी सक्रिय रहते हैं। वह अपनी पसंद के राजनेताओं का समर्थन करते रहे है। उनके लिए विशेष तौर पर छुट्टी लेकर आते हैं और काम भी करते रहते हैं। यहां तक की चंदा भी भरपूर देते थे।

डाक्टर सिंह के अनुसार 2012 के विधानसभा चुनाव में पहली बार ऐसा हुआ कि इतनी बड़ी संख्या में एनआरआई पंजाब की राजनीति में सक्रिय हो गए। इसके लिए पीपल्स पार्टी ऑफ पंजाब (पीपीपी) के संस्थापक मनप्रीत सिंह बादल ने पहल की थी। अकाली दल से अलग होने के बाद मनप्रीत बादल तब अपनी पार्टी बना रहे थे। उन्होंने एनआरआई का समर्थन हासिल करने की हर संभव कोशिश की।

एनआरआई ने उन्हें सपोर्ट भी किया। हालांकि, यह भी सच है कि तब पीपीपी कोई भी सीट जीतने में कामयाब नहीं हो पायी। लेकिन इसके बादवजूद भी पीपीपी पंजाब में अपनी उपस्थिति दर्ज कराने में कामयाब रही थी।बाद में मनप्रीत बादल कांग्रेस में शामिल हो गए।

2014 के चुनाव में आम आदमी पार्टी के प्रति एनआरआई पंजाबियों में जबरदस्त जुनून देखने को मिला। संगठित तरीके से उन्होंने आप के लिए काम किया। एक नारा दिया गया था, घर वापसी। तब विदेश से ही उन्होंने पंजाबी वोटर्स को कॉल कर चुनाव में आम आदमी का साथ देने की अपील की थी। फेसबुक पर लगातार प्रचार अभियान चलाया गया। आप ने बाद में अन्य पार्टियों की तरह विदेशों में भी अपनी इकाइयां स्थापित की।

लेकिन जिस तरह से बाद में अरविंद केजरीवाल ने पंजाब की राजनीति में जो प्रयोग किए, वह किसी न किसी स्तर पर एनआरआई को आप से दूर लेकर चले गए। प्रमुख विपक्षी दल होने के बाद भी आम आदमी पार्टी पंजाब की राजनीति में वह कुछ नहीं कर पाई जिसका दावा उनकी ओर से बार-बार किया जाता रहा। एनआरआई को लगता था कि आम आदमी पार्टी पंजाब में नशे की बिक्री, अवैध माइनिंग पर रोक लगा कर पंजाब को विकास की ओर लेकर जाएगी।लेकिन विधानसभा में प्रमुख विपक्षी दल बनने के बाद भी आम आदमी पार्टी आपसी विवाद में ही उलझी रही।

इसका नतीजा यह निकला कि हर कोई यह मान कर चलने लगा कि यह पार्टी भी दूसरी पारंपरिक राजनीतिक पार्टियों की तरह है। जिससे बदलाव की ज्यादा उम्मीद नहीं की जा सकती।
इसलिए धीरे धीरे एनआरआई का आम आदमी पार्टी से मोह भंग होता चला गया।

पंजाब के सीनियर पत्रकार दिनेश कुमार भुल्लर का मानना है कि आम आदमी पार्टी को पंजाब के एनआरआई एक विकल्प मान कर चल रहे थे। उन्हें लग रहा था कि जिस तरह से आप की ओर से दावे किए जा रहे हैं, इस पर यदि काम हुआ तो पंजाब को विकास की एक राह मिल जाएगी। उनकी उम्मीद आम आदमी पार्टी पर थी जिसे आम आदमी पार्टी पूरा नहीं कर पाई।

उन्होंने बताया कि भले ही पंजाब के लोग विदेश में दूर -दराज बैठै हो, लेकिन उनके मन में अभी भी पंजाब बसता है। वह अपने सूबे की तरक्की और बेहतरी का सपना पालते हैं। तभी तो चाहे किसान आंदोलन हो या फिर आम आदमी पार्टी उन्हें जब -जब लगता है कि पंजाब के लिए कुछ करने की जरूरत है तो वह तुरंत मोर्चे पर डट जाते हैं।

दिनेश कुमार भुल्लर ने बताया कि लेकिन इस बार जिस तरह से एनआरआई अभी तक चुप बैठे हैं, यह उनकी निराशा को दर्शा रहा है। क्योंकि तीन कृषि कानूनों के विरोध में एनआरआई ने हर संभव सहयोग किया। अब किसान संगठन भी चुनाव में हैंं लेकिन एनआरआई उनके पक्ष में भी नजर नहीं आ रहा है।

इसकी वजह यह है कि उन्हें लगता नहीं कि किसान चुनावी राजनीति में ज्यादा कुछ कर पांएगे। इसलिए वह इस बार चुप बैठे हुए हैं। दिनेश कुमार का मानना है कि यह ठीक तो नहीं है। लेकिन किया भी क्या जा सकता है? निश्चित ही इस बार अभी तक एनआरआई पंजाब चुनाव में शांत है। यह आम आदमी पार्टी के लिए एक बड़ा झटका माना जा सकता है।

Comments are closed.