सियासी सूरमाओं के अस्तित्व को नकार रहा गठबन्धन

‘साथी’ में भी नहीं दिख रहा रालोद का वजूद

शाहवेज खान

मेरठ। उत्तर प्रदेश में अपने सियासी वजूद को बचाने के लिए जैसे ही सपा- बसपा गठबन्धन के रूप में एक हुए, वैसे ही इस गठजोड़ में खुद को शामिल करने के लिए रालोद प्रमुख चौधरी अजित सिंह की सिफारिश भी माया-अखिलेश ने मान तो ली। मगर, गठबन्धन में रालोद को कोई मान नहीं दिया। इसका जीता जागता सबूत है गठबन्धन का जारी हुआ नया स्लोगन, जिसको ‘साथी’ का नाम दिया गया है। इस स्लोगन में पहले साइकिल का ‘सा’ व बाद में हाथी का ‘थी’ प्रयोग किया गया है। जबकि गठबन्धन में रालोद भी अपने अस्तित्व की लड़ाई में चुनावी मैदान में डटी हुई है।

गठबन्धन में रालोद को न तो सियासी स्लोगन में जगह दी गई और न उनके कार्यकर्ताओं व नेताओं को किसी जनसभा व जनसम्पर्क में बुलाया जा रहा है। पश्चिम की सियासत में जाट कितना असर रखते हैं, यह किसी से छुपा नहीं है। अपनी अनदेखी के चलते ही रालोद के सिपाही अब अपनी उन तीन सीटों की ओर ही कूच कर रहे हैं, जहां से रालोद के सिम्बल पर चुनाव लड़ा जा रहा है। अगर हम मेरठ की बात करें तो यहां पर जिस दिन गठबन्धन प्रत्याशी हाजी याकूब ने पर्चा भरा, उस दिन भी रालोद नेताओं को नजरंदाज किया गया। उसे देखते हुए मौके पर आए रालोद नेता उलटे पैर कचहरी से जाते हुए दिखाई दिए। वहीं अभी तक जितनी भी जनसभा मेरठ- हापुड़ लोकसभा में हुई है, उनमें रालोद का वजूद सिर्फ चुनावी पोस्टरों तक ही सीमित दिख रहा है। खुद गठबन्धन प्रत्याशी इस चुनाव में बसपा नेता व  कुछ मुस्लिम सपा नेताओं के इर्दगिर्द ही घूमते नजर आ रहे हैं। उन्हीं के द्वारा गठबन्धन की चुनावी पटकथा लिखी जा रही है। इससे जाट वोटर गठबन्धन से बुरी तरह नाराज हैं।

पश्चिम की कई सीटों पर जाटों के बिना सज रहा गठबन्धन का मंच

मौजूदा स्थिति को देखते हुए पश्चिम की कई अहम सीटों पर गठबन्धन का मंच बिना जाटों के ही सजाया जा रहा है। मेरठ में यह इसी बानगी का हिस्सा है। मेरठ में गठबन्धन को यह डर भी सता रहा है कि अगर जाटों को ज्यादा तरजीह दी गई तो मुस्लिम मतदाता नाराज होकर बीते विधानसभा की तरह कांग्रेस से हाथ मिला लिया तो गठबन्धन का बना बनाया खेल बिगड़ सकता है। खुद बसपा का मूल वोटर भी अपने आसपास जाटों को तरजीह नहीं देना चाहता। इसीलिए पश्चिम की अधिकतर उन सीटों पर रालोद को पूरी तरह नजरंदाज किया जा रहा है, जहां से प्रत्याशी बसपा के सिम्बल से चुनाव लड़ रहे हैं। यह सब बातें अब पर्दे के पीछे न हो कर सार्वजनिक हो गई हैं। इसके बाद अब जाट वोटर भी ऐसे प्रत्याशी से दूरी बनाता दिख रहा है, जो उनको तरजीह नहीं दे रहे हैं। अब इन बातों का नुकसान भी गठबन्धन को उठाना पड़ सकता है, जिसका असर मेरठ, बिजनौर, कैराना, मुरादाबाद सहित गठबन्धन की कई सीटों पर पड़ने वाला है।

अगर बात मुजफ्फरनगर सीट की हो तो यहां पर भी उलटी गंगा बहती दिख रही है। दलित वोट अजित सिंह को मिलेंगे या नहीं, इस पर भी अभी कुछ कहा नहीं जा सकता। क्योंकि इस सीट पर जाट समाज दलित नेताओं को पूरी तरह नजरअंदाज करते हुए सिर्फ मुस्लिमों को साथ लेकर चल रहे हैं। ंइससे दलित वोट इस सीट पर पूरी तरह खामोश है। उनकी खामोशी भी गठबन्धन को परेशान कर रही है। यूपी वेस्ट की सियासत करने वाले छोटे चौधरी को भी अपनी विरासत बचाने के लिए कड़ी मेहनत करनी पड़ रही है। उसके बावजूद यह सीट किसके पाले में जाएगी, यह देखने वाली बात होगी।

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