अब तक नाकाम रहा पैराशूटी प्रत्याशियों पर कांग्रेस का दांव

वर्ष-2014 में लड़ने से पहले ही हार गई थी कांग्रेस

सुबोध कुमार

नोएडा। नोएडा की जन्मदाता कांग्रेस अब अपने ही घर में बेगानी हो गई है। संजय गांधी के सपने को जमीन पर उतारने वाले नारायण दत्त तिवारी ने नहीं सोचा होगा कि इस क्षेत्र में चुनाव लड़ने के लिए पैराशूटी कैंडीडेट का सहारा लेना पड़ेगा। बीते 20 वर्षों से तो यही हो रहा है। वर्ष-1999 से 2014 तक हुए कुल चार लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने आसमानी प्रत्याशी को मैदान में उतारा। नतीजा सबके सामने है। सियासत के जानकार बताते हैं कि इस बार भी कांग्रेस अपने इतिहास को दोहराने जा रही है।

वर्ष-1999 में हुए लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित खुर्जा लोकसभा सीट से पार्टी की वरिष्ठ दलित नेता सत्या बहन को मैदान में उतारा था। सत्या बहन ने मन लगाकर चुनाव लड़ा, लेकिन उन्हें हार का सामना करना पड़ा। मूल रूप से एटा की रहने वाली सत्या बहन ने अपनी जीत की हरसंभव कोशिश की, लेकिन भाजपा के प्रत्याशी रहे अशोक प्रधान ने उन्हें पटखनी दे दी।

कांग्रेस की हार का सिलसिला वर्ष-2004 में हुए लोकसभा चुनाव में भी जारी रहा। उस चुनाव में वरिष्ठ आईएएस पेट्रोलियम सेके्रटरी रहे देवी दयाल पर पार्टी ने यकीन जताया और खुर्जा लोकसभा सीट से उन्हें अपना उम्मीदवार बनाया। मूल रूप से इटावा के रहने वाले देवी दयाल के लिए संगठन ने खूब पसीना बहाया, लेकिन नतीजा एक बार फिर भाजपा के प्रत्याशी अशोक प्रधान के पक्ष में गया।

वर्ष-2009 में 15वीं लोकसभा के लिए हुए चुनाव में कांग्रेस ने भाजपा से कांग्रेस में आए रमेश चंद तोमर पर दांव लगाया। हालांकि वह पिछले लगभग 50 साल से गाजियाबाद में रह रहे हैं, लेकिन वह भी मूल रूप से आगरा जिले के रहने वाले हैं। गाजियाबाद के एमएमएच कालेज में गणित के प्रोफेसर रहे रमेश चंद तोमर को भी हार का मुंह देखना पड़ा। उन्हें बसपा प्रत्याशी सुरेंद्र नागर ने शिकस्त दी।

रमेश चंद तोमर गाजियाबाद के लोकप्रिय नेताओं में शुमार थे। वह चार बार संसद के गलियारे में अपनी उपस्थिति दर्ज करा चुके हैं। उनकी प्रतिभा को देखते हुए कांग्रेस ने वर्ष-2014 में हुए 16वीं लोकसभा चुनाव में उन्हें एक बार फिर खुर्जा सीट से प्रत्याशी बनाया। लेकिन, उन्होंने कांग्रेस को जो घाव दिया, उसे भूलना शायद किसी के लिए भी आसान नहीं है। रमेश चंद तोमर का वह फैसला खुद उनके राजनीतिक भविष्य के लिए आत्मघाती साबित हुआ। मतदान के ठीक दो दिन पहले वह चुनाव मैदान में पीठ दिखाकर भाजपा के पाले में चले गए। ऐसे हालात में कांग्रेस लड़ने से पहले ही हार गई।

ुकांग्रेस पार्टी की यह रवायत 17वीं लोकसभा के लिए हो रहे मौजूदा चुनाव में भी बदस्तूर जारी रही। इस बार अलीगढ़ के मूल निवासी और भाजपा नेता के युवा पुत्र डॉ. अरविन्द कुमार सिंह को अपना चुनावी योद्धा बनाया है। डॉ. अरविंद वर्ष-2014 में हुए लोकसभा चुनाव में अलीगढ़ से बसपा के टिकट पर अपनी किस्मत आजमा चुके हैं। लेकिन, तब उन्हें अपने ही घर में हार का मुंह देखना पड़ा था, जबकि उनके पिता बसपा के कद्दावर नेताओं में शुमार थे और मायावती सरकार में कैबिनेट मंत्री थे। फिर भी उन्हें संसद के गलियारे में जाने का सौभाग्य नहीं मिला।

सियासी गलियारे में इस बात की चर्चा आम है कि कांग्रेस ने जब से पैराशूटी या हवाई प्रत्याशी को लाने की परंपरा शुरू की, तभी से उसकी स्थिति चुनाव दर चुनाव खराब होती गई। अब 17वीं लोकसभा के लिए होने वाले मतदान में सिर्फ 10 दिनों का समय शेष है। चर्चा तो यही है कि इस बार भी कांग्रेस अपने इतिहास को दोहराएगी। लेकिन यह 23 मई को ही तय होगा कि कांगे्रस को 35 वर्ष से खोई अपनी राजनीतिक जमीन मिलेगी या नहीं।

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