दलेलपुर गांव के लोगों को मुंह चिढ़ा रहा है ‘सबका साथ-सबका विकास’ का नारा

- वोट डालने के लिए 90 किलोमीटर की दूरी तय करते हैं गांव के लोग

ग्रेटर नोएडा। देश के मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी वर्ष-2014 में खुद को मां गंगा का पुत्र कहकर सत्ता तक पहुंच गए। पांच साल बाद यानि मौजूदा लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की महासचिव प्रियंका गांधी मां गंगा की गोद में बैठकर अपनी चुनावी नैया को पार लगाने की जुगत में हैं। लेकिन, उत्तर प्रदेश के शो-विंडो कहे जाने वाले गौतमबुद्ध नगर के ग्रेटर नोएडा क्षेत्र के दलेलपुर गांव के लोगों को वोट डालने के लिए 90 किलोमीटर की यात्रा करनी पड़ती है। इस दौरान उन्हें हरियाणा और दिल्ली राज्य को पार कर नोएडा होते हुए ग्रेटर नोएडा स्थित पोलिंग बूथ तक जाना पड़ता है। इस गांव के लोगों के लिए ग्रेटर नोएडा पहुंचने का एक और विकल्प है। वह जोखिम भरा है। उन्हें नाव से यमुना नदी पार कर पोलिंग बूथ तक पहुंचना होता है, लेकिन इस रास्ते से आने के लिए उन्हें 08 किलोमीटर की पदयात्रा करनी पड़ती है।

कहते हैं, अगर शिद्दत से किसी चीज को चाहो तो सारी कायनात उससे मिलाने में जुट जाती है। लेकिन, ये अल्फाज दिलेलपुर गांववालों के लिए ‘जुमला’ ही साबित हुआ। इस गांव के लोगों को मोदी सरकार नारा ‘सबका साथ-सबका विकास’ मुंह चिढ़ा रहा है। दिलेलपुर गांव का वजूद देश में हुए पहले आम चुनाव यानि 1952 से है। लेकिन, सरकारों की अनदेखी और प्रशासनिक उपेक्षा के कारण बीते 67 साल में ऐसे कोई इंतजाम नहीं हुए, जिससे लोगों को वोट डालने के अपने संवैधानिक अधिकार का इस्तेमाल करने के लिए 90 किलोमीटर की यात्रा करनी पड़ती है।

जिला प्रशासन व सरकार के द्वारा आज तक कोई ऐसी व्यवस्था नहीं की गई के इन लोगों को उन्हीं के गांव में मतदान केंद्र बनाकर इनको भी सहुलियत दी जा सके लोगों का कहना है कि इन लोगों से आज तक ना तो किसी नेता के द्वारा वोट मांगी गई है और ना ही इनके गांव का विकास किया गया है।

गांव के रहने वाले बालकिशन, महेंद्र सिंह, नीरज त्यागी और हरि श्याम कहते हैं कि ग्रेटर नोएडा के दलेलपुर जाने का रास्ता फरीदाबाद होते हए जाता है। दिल्ली के कालिंदी कुंज से करीब 50 किलोमीटर दूर। अगर इस गांव के लोग वोट डालने जाएं, तो पहले उन्हें फरीदाबाद जाना होता है। वहां से दिल्ली, फिर नोएडा और उसके बाद ग्रेटर नोएडा। दलेलपुर गांव का पोलिंग बूथ गुलावली में है, जो यमुना एक्सप्रेसवे से लगा हुआ है। वह बताते हैं कि पोलिंग बूथ पर पहुंचने का एक दूसरा जरिया भी है, जो जोखिम भरा है। इसके लिए गांव के लोगों को यमुना नदी लांघनी पड़ती है। यह भले शॉर्टकट रास्ता है, लेकिन यमुना तट पर पहुंचने के लिए गांववालों को पहले तीन किलोमीटर पैदल चलना पड़ता है। फिर नाव से यमुना नदी पार करनी होती है। नदी पार उतरने के बाद एक बार फिर पांच किलोमीटर पैदल चलना पड़ता है।

गांव के लोग बताते हैं कि पहले यह गांव हरियाणा के फरीदाबाद में था। 1982 के बाद से ग्रेटर नोएडा का हिस्सा बन गया। तब यह गाजियाबाद जिले का हिस्सा था और उस समय गाजियाबाद और हरियाणा की सीमा तय की गई। वर्ष-1997 में यह गांव गौतमबुद्ध नगर में शामिल हो गया। इस गांव में लगभग 60 घर और आबादी करीब 300 की है। यहां 160 वोटर हैं। गांव वालों का कहना है कि कई बार अधिकारियों से गुहार लगाई गई, लेकिन इस गांव में पोलिंग बूथ नहीं बनाया गया। विकास को तरसते इस गांव की बिजली फरीदाबाद के भरोसे है। सड़कें बदहाल हैं। स्वास्थ्य तथा शिक्षा जैसी बुनियादी जरूरतों के लिए भी फरीदाबाद का ही मुंह देखना पड़ता है। गांव वाले बताते हैं कि चुनाव के समय भी उम्मीदवार नहीं, बस उनके नुमाइंदे ही यहां पहुंचते हैं। चुनावी मौसम होने के बावजूद गांव में न चुनाव का शोर है और न ही चुनाव की चर्चा। लेकिन, हौसले से लबरेज गांव के लोग वोटिंग करने को बेताब हैं। वह कहते हैं कि लोकतंत्र के महान उत्सव में भाग लेने से वे कैसे पीछे रह सकते हैं। तमाम जोखिम और खर्च के बावजूद इस गांव के लोग वोट करना नहीं भूलते हैं। शायद इस आस में कि कभी कोई तो इनकी सुध लेगा।

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