यशवंत सिन्हा ने दाखिल किया नामांकन, राष्ट्रपति प्रत्याशी के समर्थन को लेकर एकजुट दिखा विपक्ष

-नामांकन के अवसर पर 17 विपक्षी दलों की उपस्थिति ने 2024 के लोकसभा चुनाव की लड़ाई को भी बना दिया रोचक

नई दिल्ली। राष्ट्रपति पद के लिए विपक्षी दलों के संयुक्त उम्मीदवार यशवंत सिन्हा ने सोमवार को अपना नामांकन दाखिल कर दिया। उनके नामांकन के अवसर पर कांग्रेस सहित 17 विपक्षी पार्टियों के नेता उपस्थित रहे। हालांकि, राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) की ओर से राष्ट्रपति पद के लिए द्रौपदी मुर्मू की उम्मीदवारी सामने आने के बाद विपक्षी खेमे के कई दलों के मुर्मू के साथ आने की बात कही जा रही थी। मगर, सिन्हा के नामांकन दाखिल करने के अवसर पर कांग्रेस नेता राहुल गांधी, मल्लिकार्जुन खड़गे और जयराम रमेश के साथ शरद पवार, ममता बनर्जी, फारुख अब्दुल्ला, ए राजा, अखिलेश यादव और जयंत चौधरी की उपस्थिति ने 2024 के लोकसभा चुनाव की लड़ाई को भी रोचक बना दिया है। ये वे नेता हैं जो अपने-अपने क्षेत्रों में भाजपा को कड़ी टक्कर दे रहे हैं।

वर्तमान में जिस तरह एक के बाद एक विपक्ष के नेता ईडी, सीबीआई और इनकम टैक्स जैसी केंद्रीय एजेंसियों के निशाने पर आ रहे हैं, 2024 के रण में विपक्ष को एक साथ लाने के लिए यह बड़ा कारण बन सकता है। यदि पश्चिम बंगाल में टीएमसी नेता ममता बनर्जी, महाराष्ट्र से एनसीपी नेता शरद पवार और शिवसेना नेता उद्धव ठाकरे, तेलंगाना से केसीआर, उत्तर प्रदेश से अखिलेश यादव-जयंत चौधरी और इसी प्रकार अन्य राज्यों के बड़े दल साथ आकर चुनाव लड़ते हैं तो इससे एनडीए के सामने मजबूत चुनौती दी जा सकती है। लोकसभा सीटों के मामले में इन राज्यों की कुल सीटें विपक्षी दलों को एक ऐसी लड़ाई का मैदान दे सकती हैं, जहां इनकी बढ़त आगामी लोकसभा की तस्वीर बदल सकती है।

द्रौपदी मुर्मू के नाम पर बसपा, वाईएसआर कांग्रेस पार्टी और बीजू जनता दल ने अपना समर्थन एनडीए को अवश्य दे दिया है, लेकिन बाद की परिस्थितियों में यह समर्थन एनडीए खेमे को नहीं मिलने वाला है। इनके साथ आने से विपक्षी दलों के खेमे को मजबूती दे सकता है। शरद पवार जैसे दिग्गज नेता के होने से इस गठबंधन को मजबूती भी दी जा सकती है। कुछ राज्यों में विपक्षी दलों के परस्पर हित आपस में टकरा सकते हैं, लेकिन एक सहमति बनाकर इस लड़ाई को मजबूती दी जा सकती है।

ईडी जांच की परीक्षा से गुजर रहे राहुल गांधी इस अवसर पर न केवल उपस्थित रहे, बल्कि मजबूती से अपने स्टैंड पर कायम भी दिखे। यशवंत सिन्हा की उम्मीदवारी को उन्होंने दो विपरीत विचारधाराओं की लड़ाई बताया। उन्होंने कहा कि आरएसएस अतिवादी सोच से ग्रस्त है जबकि उनकी सोच प्यार और शांति की है। अतिवादी विचारधारा एक छोटे समय के लिए होती है, जबकि प्यार स्थाई और हमेशा मौजूद रहता है।

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